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Calcium की कमी क्या होती है भूल जाओगे ! हाथ/पैर, घुटनों, कमर दर्द जड़ से गायब

Calcium की कमी क्या होती है भूल जाओगे ! हाथ/पैर, घुटनों, कमर दर्द जड़ से गायब

बाजरा या रागी सामान्यतः दक्षिण भारत के रसोईंघरों में नियमित रूप से प्रयोग किया जाता है। वास्तव में यह दक्षिण भारत के कई गावों का प्रमुख भोजन है। रागी कैल्शियम, लौह, प्रोटीन, रेशे और अन्य खनिजों का समृद्ध स्रोत है। इस अनाज में वसा की मात्रा कम होती है और यह मुख्यतः असंतृप्त वसा होता है। यह पचने में आसान होता है और ग्लूटिन नहीं होता, इसलिये जो लोग ग्लूटिन के प्रति संवेदनशील होते हैं वे बाजरे को आसानी से प्रयोग कर सकते हैं।

रागी को सबसे अधिक पोषण वाले अनाजों में से एक माना जाता है। रागी एक अत्यधिक पोषणयुक्त अनाज है और अच्छे स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिये लाभदायक है। हलाँकि इसके अधिक मात्रा में सेवन से शरीर में ऑक्सैलिक अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है। इसलिये वृक्क में पथरी वाले मरीजों को इसकी सलाह नहीं दी जाती।

मोटापा कम करने के लिये रागी

रागी में एक अमीनो अम्ल ट्रिप्टोफैन होता है जिससे भूख कम लगती है और भार को नियन्त्रित करने में सहायक होता है। रागी धीमी दर से पचता है इसलिये अतिरिक्त कैलोरी ग्रहण करने से रोकता है। रागी में रेशे होने के कारण भी पेट भरा होने का अहसास होता है इसलिये अतिरिक्त भोजन की खपत को नियन्त्रित करता है।

हड्डियों के स्वास्थ्य के लिये रागी

रागी कैल्शियम के मामले में समृद्ध होता है इसलिये हड्डियों को मजबूत बनाने में सहायक होता है। यह बढ़ते बच्चों और वृद्ध हो रहे लोगों के लिये कैल्शियम का सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक स्रोत है।

मधुमेह के लिये रागी

बाजरे में उपस्थित रसायन पाचन की प्रक्रिया को धीमा करने में सहायक होते हैं। मधुमेह की स्थिति में यह रक्त में शर्करा की मात्रा को नियन्त्रित करने में सहायक होता है।

रक्त में कोलेस्ट्रॉल की कमी के लिये रागी

इसमें लेसिथिन और मिथियोनिन नामक अमीनो अम्ल होते हैं जो यकृत से अतिरिक्त वसा को हटा कर कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करते हैं।

खून की कमी के लिये रागी

रागी लौह का बहुत अच्छा प्राकृतिक स्रोत है। रागी की खपत से खून की कमी की स्थिति बेहतर होती है।

शान्ति के लिये रागी

रागी की खपत से शरीर प्राकृतिक रूप से शान्त होता है। यह उत्सुक्ता, अवसाद और नींद न आने की स्थितियों में फायदेमन्द होता है। रागी माइग्रेन के लिये भी लाभदायक है।

प्रोटीन या अमीनो अम्ल के लिये रागी

शरीर की सामान्य क्रियाशीलता तथा मरम्मत के लिये आवश्यक अमीनो अम्ल के मामले में रागी काफी धनी है। यह शरीर में नाइट्रोजन सन्तुलन के लिये भी सहायक है।

अन्य स्वास्थ्य स्थितियों के लिये रागी

यदि रागी का नियमित रूप से सेवन किया जाय तो यह कुपोषण, क्षरण सम्बन्धी रोग और असमय वृद्ध होने की प्रक्रियाओं को दूर करता है।

उच्च रक्त चाप को ठीक करता है

उच्च रक्तचाप, यकृत रोगों, हृदय की कमजोरी, अस्थमा से ग्रस्त लोगों तथा दूध पिलाने वाली माताओं में दूध की कमी के लिये यह टॉनिक का कार्य करता है।

साबूदाना

सफेद मोतियों की तरह दिखने वाला छोटे आकार क साबूदान व्रत-उपवास में प्रमुख रूप से खाया जाता है। वैसे तो इसका प्रयोग केवल फलाहार के तौर पर किया जाता है, लेकिन इसके गुणों से अभी तक कई लोग अनजान ही है। अगर आप भी नहीं जानते इसके गुणों के बारे में तो जानिए साबूदाने के यह 10 प्रमुख लाभ

1 गर्मी पर नियंत्रण

एक शोध के अनुसार साबूदाना आपको तरोताजा रखने में मदद करता है, और इसे चावल के साथ प्रयोग किए जाने पर यह शरीर में बढ़ने वाली गर्मी को कम कर देता है।

2 दस्त लगने पर

जब किसी कारण से पेट खराब होने पर दस्त या अतिसार की समस्या होती है, तो ऐसे में बगैर दूध डाले साबूदाने की बनी हुई खीर बेहद असरकारक साबित होती है और तुरंत आराम देती है।

3 ब्लड प्रेशर

साबूदाने में पाया जाने वाल पोटेशियम रक्त संचार को बेहतर कर, उसे नियंत्रित करता है, जिससे ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है। इसके अलावा यह मांसपेशियों के लिए भी फयदेमंद है।

4 पेट की समस्याएं

पेट में किसी भी प्रकार की समस्या होने पर साबूदाना खाना काफी लाभप्रद सिद्ध होता है, और यह पाचनक्रिया को ठीक कर गैस, अपच आदि समस्याओं में भी लाभ देता है।

5 एनर्जी

साबूदाना कार्बोहाइड्रेट का एक अच्छा स्त्रोत है, जो शरीर में तुरंत और आवश्यक उर्जा देने में बेहद सहायक होता है।

6 गर्भ के समय

साबूदाने में पाया जाने वाला फोलिक एसिड और विटामिन बी कॉम्प्लेक्स गर्भावस्था के समय गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में सहायक होता है।

7 हड्डियां बने मजबूत

साबूदाने में कैल्शियम, आयरन, विटामिन-के भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाए रखने और अवश्यक लचीलेपन के लिए बहुत फायदेमंद होता है।

8 वजन

जिन लोगों में ईटिंग डिसऑर्डर की समस्या होती है उनक वजन आसानी से नहीं बढ़ पाता। ऐसे में साबूदाना एक बेहतर विकलप होता है जा उसका वजन बढ़ाने में सहायक है।

9 थकान

साबूदाना खाने से थकान कम होती है। यह थकान कम कर शरीर में आवश्यक उर्जा के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है।

10 त्वचा

साबूदाने का फेसमास्क बनाकर लागाने से चेहरे पर कसाव आता है, और झुर्रियां भी कम होती है। यह त्वचा में कसाव बनाए रखने के लिए भी फायदेमंद है।

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खर्राटे, सर्दी जुकाम, बाल झाड़ना, मूत्र समस्या, कब्ज आदि का घरेलू उपचार इलाज

खर्राटे, सर्दी जुकाम, बाल झाड़ना, मूत्र समस्या, कब्ज आदि का घरेलू उपचार इलाज

बच्चों की नाक अगर बहुत बहती है बार बार सर्दी जुकाम होता है वागभट्ट जी कहते हैं नाक बहुत बहती हो, सर्दी जुकाम हो तो गौ का घी एक एक बूँद नाक मैं डाल दो सर्दी जुकाम ऐसे गायब होगा जैसे गधे के सिर से सींग.

अगर नींद नही आती या अच्छी नींद लेनी है, गहरी नींद लेनी है गाय का घी एक एक बूँद नाक में डालकर सो जाओ बहुत गहरी नींद आयेगी. आपको खराटे बंद करने हैं, तो जिनको भी खराटे आते हैं रात में तो गाय का घी एक एक बूँद नाक में डाल लो 3 दिन बाद चौथे दिन से खराटे आने बंद हो जाएंगे.

अगर आपके बाल झड़ते हैं तो गाय का दूध लें उसकी दही बनाओ. उस दही को 5-6 दिन तांबे के बर्तन में रहने दो. दही का रंग हरा-हरा हो जायेगा. फिर उस दही को बालों में लगाओ फिर 1 घंटे बाद शिकाकाई से बाल धो लो हफ्ते में ऐसा 4 बार करें और बाल टूटना एक ही हफ्ते में बंद हो जायेंगे. भविष्य में बाल न टूटें, अच्छे रहें, दरुस्त रहें, तंदरुस्त रहें तो महीने में एक बार या फिर दो बार गाय के मूत्र से बाल धो लें. बहुत अच्छा नेचुरल कंडीशनर है. तो जैसे कंडीशनर यूज करते हैं वैसे ही गौमूत्र का इस्तेमाल करें गाय के मूत्र में थोडा पी मिला लें और जैसे कंडीशनर यूज करते हैं वैसे ही इस्तेमाल करें.

अगर बच्चों की पसलियाँ बहुत ही तकलीफ में हो, जैसे कि कई बार पसलियों में बलगम जम गया तो एक ही चम्मच गौ मूत्र पिला दें. एक ही दिन में बलगम बाहर आ जाएगी. बड़ों को अगर पीना है तो आधे कप तक पी सकते हैं.

इसके बाद जितने भी किडनी या मूत्र सम्बंधित रोग है इनमें सबसे अच्छी दवा है गौमूत्र. जैसे अगर पेशाब थोडा थोडा आता है गौमूत्र पीना शुरू करो खुल के आएगा. पेशाब में जलन होती है पेशाब पीना शुरू करें जलन बंद हो जाएगी. पेशाब अगर लाल रंग का आता है तो गौमूत्र पीना शुरू करो. नार्मल कलर आयेगा मूत्र के लगभग 22-23 रोग इस अकेले गौमूत्र से आता हैं.

यदि आपको कब्जियत बहुत है पेट साफ़ नही हो रहा है तीन दिन आधा आध कप गौमूत्र पी लो चोथे दिन से पेट एक दम साफ़.

फिर यदि आपके शरीर में बीसियों रोग हैं वात, पित्त और कफ के. पित्त के रोगी विशेष दयां रखें कि जब वे गौमूत्र लें तो गौ का घी ज्यादा उपयोग करें. पेट में गैस बन रही है या एसिडिटी बन रही है ये रोग पित्त के रोग हैं. यदि इसे ठीक करने के लिए गौ मूत्र का उपयोग कर रहे हैं तो घी ज्यादा खाएं.

यदि आपके शरीर पे जितने भी सफ़ेद दाद या धब्बे है सब चले जायेंगे. आँखों के नीचे डार्क सर्किल है रोज सुबह आँखों के नीचे लगा लें. डार्क सर्किल चले जायेगे खाज-खुजली या दाद हो गये हैं तो थोड़ी मालिश करिए तुरंत चला जायेगा.

नोट : ध्यान यहाँ सभी जगह सिर्फ देशी गाय के घी, मूत्र का ही जिक्र किया गया हैं किसी अन्य नस्ल की गाय का घी, मूत्र उपयोगी नही है.

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वागभट्ट जी कहते हैं आँख का कोई भी रोग सभी कफ के रोग है जैसे मोतियाबिंद, ग्लूकोमा और रेटिनल डीटेचमेंट जिसका तो दुनिया में कोई भी इलाज है ही नही ऑपरेशन भी नही है उसका हो भी तो सफल नही है अगर अमेरिका भी चले जायें इलाज के लिए तो डॉक्टर भी कहेंगे ओप्रतिओं तो कर देंगे लेकिन विज़न आने की कोई गारंटी नही है, और आँखों का लाल होना आँखों से पानी आना आँखों में जलन होना तो ऐसी छोटी से लेकर बड़ी बीमारी ये सभी गौमूत्र से ठीक होती हैं

और कंट्रोल नही क्योर(cure) होती है जड़ से खत्म होती है बस करना इतना ही है कि देसी गाय का मूत्र कपडे से छानकर एक एक बूँद आँख में डालनी है सवा 1 महीने में चश्मे का नंबर बदल जायेगा और 3 महीने में चश्मा उतर जायेगा ग्लूकोमा 4 सवा 4 महीने में बिलकुल ठीक होता है केटरेक्ट अगर ठीक करना हो तो 6 महीने में ठीक हो जायेगा और रेटिनल डीटेचमेंट अगर ठीक करना हो तो 1 साल से डेढ़ साल तक लगता है लेकिन लगातार डालते रहिये 1-1 बूँद गौमूत्र डालते रहिये.

बच्चों के अगर कान बह रहे हैं कान से अगर मवाद निकल रहा है तो 2 या 3 दिन 1-1 बूँद सुबह शाम डाल दीजिये मवाद निकलना बंद हो जायेगा.

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कभी भी गिलास में पानी ना पियें, जानिए लोटा और गिलास के पानी में अंतर

कभी भी गिलास में पानी ना पियें, जानिए लोटा और गिलास के पानी में अंतर

भारत में हजारों साल की पानी पीने की जो सभ्यता है वो गिलास नही है, ये गिलास जो है विदेशी है. गिलास भारत का नही है. गिलास यूरोप से आया. और यूरोप में पुर्तगाल से आया था. ये पुर्तगाली जबसे भारत देश में घुसे थे तब से गिलास में हम फंस गये. गिलास अपना नही है. अपना लौटा है. और लौटा कभी भी एकरेखीय नही होता. तो वागभट्ट जी कहते हैं कि जो बर्तन एकरेखीय हैं उनका त्याग कीजिये. वो काम के नही हैं. इसलिए गिलास का पानी पीना अच्छा नही माना जाता. लौटे का पानी पीना अच्छा माना जाता है. इस पोस्ट में हम गिलास और लोटा के पानी पर चर्चा करेंगे और दोनों में अंतर बताएँगे.

फर्क सीधा सा ये है कि आपको तो सबको पता ही है कि पानी को जहाँ धारण किया जाए, उसमे वैसे ही गुण उसमें आते है. पानी के अपने कोई गुण नहीं हैं. जिसमें डाल दो उसी के गुण आ जाते हैं. दही में मिला दो तो छाछ बन गया, तो वो दही के गुण ले लेगा. दूध में मिलाया तो दूध का गुण.

लौटे में पानी अगर रखा तो बर्तन का गुण आयेगा. अब लौटा गोल है तो वो उसी का गुण धारण कर लेगा. और अगर थोडा भी गणित आप समझते हैं तो हर गोल चीज का सरफेस टेंशन कम रहता है. क्योंकि सरफेस एरिया कम होता है तो सरफेस टेंशन कम होगा. तो सरफेस टेंशन कम हैं तो हर उस चीज का सरफेस टेंशन कम होगा. और स्वास्थ्य की दष्टि से कम सरफेस टेंशन वाली चीज ही आपके लिए लाभदायक है.अगर ज्यादा सरफेस टेंशन वाली चीज आप पियेंगे तो बहुत तकलीफ देने वाला है. क्योंकि उसमें शरीर को तकलीफ देने वाला एक्स्ट्रा प्रेशर आता है.

गिलास और लोटा के पानी में अंतर

गिलास के पानी और लौटे के पानी में जमीं आसमान का अंतर है. इसी तरह कुंए का पानी, कुंआ गोल है इसलिए सबसे अच्छा है. आपने थोड़े समय पहले देखा होगा कि सभी साधू संत कुए का ही पानी पीते है. न मिले तो प्यास सहन कर जाते हैं, जहाँ मिलेगा वहीं पीयेंगे. वो कुंए का पानी इसीलिए पीते है क्यूंकि कुआ गोल है, और उसका सरफेस एरिया कम है. सरफेस टेंशन कम है. और साधू संत अपने साथ जो केतली की तरह पानी पीने के लिए रखते है वो भी लोटे की तरह ही आकार वाली होती है. जो नीचे चित्र में दिखाई गई है.

सरफेस टेंशन कम होने से पानी का एक गुण लम्बे समय तक जीवित रहता है. पानी का सबसे बड़ा गुण है सफाई करना. अब वो गुण कैसे काम करता है वो आपको बताते है. आपकी बड़ी आंत है और छोटी आंत है, आप जानते हैं कि उसमें मेम्ब्रेन है और कचरा उसी में जाके फंसता है. पेट की सफाई के लिए इसको बाहर लाना पड़ता है. ये तभी संभव है जब कम सरफेस टेंशन वाला पानी आप पी रहे हो. अगर ज्यादा सरफेस टेंशन वाला पानी है तो ये कचरा बाहर नही आएगा, मेम्ब्रेन में ही फंसा रह जाता है.

दुसरे तरीके से समझें, आप एक एक्सपेरिमेंट कीजिये. थोडा सा दूध ले और उसे चेहरे पे लगाइए, 5 मिनट बाद रुई से पोंछिये. तो वो रुई काली हो जाएगी. स्किन के अन्दर का कचरा और गन्दगी बाहर आ जाएगी. इसे दूध बाहर लेकर आया. अब आप पूछेंगे कि दूध कैसे बाहर लाया तो आप को बता दें कि दूध का सरफेस टेंशन सभी वस्तुओं से कम है. तो जैसे ही दूध चेहरे पर लगाया, दूध ने चेहरे के सरफेस टेंशन को कम कर दिया क्योंकि जब किसी वस्तु को दूसरी वस्तु के सम्पर्क में लाते है तो वो दूसरी वस्तु के गुण ले लेता है.

इस एक्सपेरिमेंट में दूध ने स्किन का सरफेस टेंशन कम किया और त्वचा थोड़ी सी खुल गयी. और त्वचा खुली तो अंदर का कचरा बाहर निकल गया. यही क्रिया लोटे का पानी पेट में करता है. आपने पेट में पानी डाला तो बड़ी आंत और छोटी आंत का सरफेस टेंशन कम हुआ और वो खुल गयी और खुली तो सारा कचरा उसमें से बाहर आ गया. जिससे आपकी आंत बिल्कुल साफ़ हो गई. अब इसके विपरीत अगर आप गिलास का हाई सरफेस टेंशन का पानी पीयेंगे तो आंते सिकुडेंगी क्यूंकि तनाव बढेगा. तनाव बढते समय चीज सिकुड़ती है और तनाव कम होते समय चीज खुलती है. अब तनाव बढेगा तो सारा कचरा अंदर जमा हो जायेगा और वो ही कचरा भगन्दर, बवासीर, मुल्व्याद जैसी सेंकडो पेट की बीमारियाँ उत्पन्न करेगा.

इसलिए कम सरफेस टेंशन वाला ही पानी पीना चाहिए. इसलिए लौटे का पानी पीना सबसे अच्छा माना जाता है, गोल कुए का पानी है तो बहुत अच्छा है. गोल तालाब का पानी, पोखर अगर खोल हो तो उसका पानी बहुत अच्छा. नदियों के पानी से कुंए का पानी अधिक अच्छा होता है. क्योंकि नदी में गोल कुछ भी नही है वो सिर्फ लम्बी है, उसमे पानी का फ्लो होता रहता है. नदी का पानी हाई सरफेस टेंशन वाला होता है और नदी से भी ज्यादा ख़राब पानी समुन्द्र का होता है उसका सरफेस टेंशन सबसे अधिक होता है.

अगर प्रकृति में देखेंगे तो बारिश का पानी गोल होकर धरती पर आता है. मतलब सभी बूंदे गोल होती है क्यूंकि उसका सरफेस टेंशन बहुत कम होता है. तो गिलास की बजाय पानी लौटे में पीयें. तो लौटे ही घर में लायें. गिलास का प्रयोग बंद कर दें. जब से आपने लोटे को छोड़ा है तब से भारत में लौटे बनाने वाले कारीगरों की रोजी रोटी ख़त्म हो गयी. गाँव गाँव में कसेरे कम हो गये, वो पीतल और कांसे के लौटे बनाते थे. सब इस गिलास के चक्कर में भूखे मर गये. तो वागभट्ट जी की बात मानिये और लौटे वापिस लाइए.

सब लिख पाना असंभव है ये विडियो देखें >>

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10 गुणा लाभ देने वाली इस तकनिकी का जवाब नही, हर गाँव तक पहुचनी चाहिए

10 गुणा लाभ देने वाली इस तकनिकी का जवाब नही, हर गाँव तक पहुचनी चाहिए

मध्य प्रदेश के धार जिले के एक किसान रवि पटेल ने प्याज स्टोरेज की एक देसी कारगर तकनीक बनाई है। इसे अपनाकर वे दो साल से प्याज को खेत से निकालते ही 2 से 3 रुपए किलो के भाव पर बेचने के बजाय बारिश बाद 30 से 35 रुपए किलाे में बेच कर लाभ कमा रहे हैं। तीसरे साल भी उन्होंने प्याज का इसी तकनीक से स्टोरेज किया है।

इस किसान ने देसी टेक्नोलॉजी से बनाया कोल्ड स्टोरेज, ऐसे करता है काम >>

कैसे काम करती है रवि की ये टेक्नोलॉजी…

– रवि बंद कमरे में लोहे की जाली को जमीन से 8 इंच ऊंचा बिछाते हैं। ऐसा करने के लिए कुछ-कुछ दूरी पर दो-दो ईंटें रखते हैं। उसके ऊपर प्याज का स्टोरेज करते हैं।

– लगभग 100 स्क्वेयर फीट की दूरी पर एक बिना पैंदे की कोठी रखते हैं। ड्रम के ऊपरी हिस्से में एक्जॉस्ट पंखे लगा देते हैं।

– पंखे की हवा जाली के नीचे से प्याजों के निचले हिस्से से उठ कर ऊपर तक आती है। इससे पूरे प्याजों में ठंडक रहती है।

– दोपहर में हवा गर्म होती है, इसलिए दिन की बजाय रातभर पंखे चलाते हैं।

– पटेल ने इस तकनीक से 1000 क्विंटल प्याज का भंडारण किया है। 2000 क्विंटल और खेतों में हैं, जो इसी तरह भंडारण करने वाले हैं। पिछले साल उन्होंने बारिश बाद 200 क्विंटल प्याज 35 रु. किलो के भाव बेचे थे।

– पटेल ने बताया इस तकनीक से 80 प्रतिशत तक सड़न नियंत्रित होती है। पहले जहां 10 प्याज खराब होते थे, तो अब 2 होते हैं।

– वजह यह है कि किसी प्याज में सड़न लगती थी, तो आसपास के प्याज खराब कर देता था। अब कोई प्याज सड़ता है तो पंखे की हवा से वहीं सूख जाता है।

क्या कहते हैं रवि पटेल

पटेल बताते हैं प्याज की फसल अमूमन मार्च-अप्रैल में निकलती है। इस समय आवक अधिक होने से प्याज का मंडी भाव 2 से 3 रु. किलाे तक पहुंच जाता है। बारिश के बाद यही भाव 30 से 35 रु. किलो न्यूनतम होता है लेकिन प्याज गर्मी से जल्दी खराब होने के कारण इसका स्टोरेज किसान के लिए चुनौती होता है। किसान जहां भंडारण करते हैं, वहां पंखे-कूलर की व्यवस्था करते हैं लेकिन ढेर में प्याज एक-दूसरे की गर्मी से ही खराब हो जाते हैं। इसलिए मैंने ऐसी तकनीक लगाई है कि हर प्याज को जमीन से ही ठंडक मिले। कोई प्याज खराब भी हो तो ढेर में मौजूद आसपास के प्याज खराब नहीं हो।

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